श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.32

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं सांगोपांगास्त्रपार्षदम्।

यज्ञैः संकीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः॥ ३२

kṛṣṇavarṇaṃ tviṣākṛṣṇaṃ sāṃgopāṃgāstrapārṣadam|

yajñaiḥ saṃkīrtanaprāyairyajanti hi sumedhasaḥ|| 32

अर्थ

कलियुगमें भगवान्‌का श्रीविग्रह होता है कृष्णवर्ण—काले रंगका। जैसे नीलम मणिमेंसे उज्ज्वल कान्तिधारा निकलती रहती है, वैसे ही उनके अंगकी छटा भी उज्ज्वल होती है। वे हृदय आदि अंग, कौस्तुभ आदि उपांग, सुदर्शन आदि अस्त्र और सुनन्द प्रभृति पार्षदोंसे संयुक्त रहते हैं। कलियुगमें श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्‍न पुरुष ऐसे यज्ञोंके द्वारा उनकी आराधना करते हैं जिनमें नाम, गुण, लीला आदिके कीर्तनकी प्रधानता रहती है॥ ३२॥✎ 1734 1735

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1734 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: राज्य-लक्ष्मीको → राज्यलक्ष्मीको
  • #1735 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कृष्ण-वर्ण—काले → कृष्णवर्ण—काले

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