श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.33

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

ध्येयं सदा परिभवघ्नमभीष्टदोहं

तीर्थास्पदं शिवविरिंचिनुतं शरण्यम्।

भृत्यार्तिहं प्रणतपाल भवाब्धिपोतं

वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम्॥ ३३

dhyeyaṃ sadā paribhavaghnamabhīṣṭadohaṃ

tīrthāspadaṃ śivaviriṃcinutaṃ śaraṇyam|

bhṛtyārtihaṃ praṇatapāla bhavābdhipotaṃ

vande mahāpuruṣa te caraṇāravindam|| 33

अर्थ

वे लोग भगवान्‌की स्तुति इस प्रकार करते हैं—‘प्रभो! आप शरणागत रक्षक हैं। आपके चरणारविन्द सदा-सर्वदा ध्यान करनेयोग्य, माया-मोहके कारण होनेवाले सांसारिक पराजयोंका अन्त कर देनेवाले तथा भक्तोंकी समस्त अभीष्ट वस्तुओंका दान करनेवाले कामधेनुस्वरूप हैं। वे तीर्थोंको भी तीर्थ बनानेवाले स्वयं परम तीर्थस्वरूप हैं; शिव, ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े देवता उन्हें नमस्कार करते हैं और चाहे जो कोई उनकी शरणमें आ जाय उसे स्वीकार कर लेते हैं। सेवकोंकी समस्त आर्ति और विपत्तिके नाशक तथा संसार-सागरसे पार जानेके लिये जहाज हैं। महापुरुष! मैं आपके उन्हीं चरणारविन्दोंकी वन्दना करता हूँ॥ ३३॥✎ 1734 1735

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1734 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: राज्य-लक्ष्मीको → राज्यलक्ष्मीको
  • #1735 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कृष्ण-वर्ण—काले → कृष्णवर्ण—काले

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