॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.5.42
स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य
त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः।
विकर्म यच्चोत्पतितं कथंचिद्
धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः॥ ४२
svapādamūlaṃ bhajataḥ priyasya
tyaktānyabhāvasya hariḥ pareśaḥ|
vikarma yaccotpatitaṃ kathaṃcid
dhunoti sarvaṃ hṛdi sanniviṣṭaḥ|| 42
अर्थ
जो प्रेमी भक्त अपने प्रियतम भगवान्के चरण-कमलोंका अनन्यभावसे—दूसरी भावनाओं, आस्थाओं, वृत्तियों और प्रवृत्तियोंको छोड़कर—भजन करता है, उससे, पहली बात तो यह है कि पापकर्म होते ही नहीं; परन्तु यदि कभी किसी प्रकार हो भी जायँ तो परमपुरुष भगवान् श्रीहरि उसके हृदयमें बैठकर वह सब धो-बहा देते और उसके हृदयको शुद्ध कर देते हैं॥ ४२॥