श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.43

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नारद उवाच

धर्मान् भागवतानित्थं श्रुत्वाथ मिथिलेश्‍वरः।

जायन्तेयान् मुनीन् प्रीतः सोपाध्यायो ह्यपूजयत्॥ ४३

dharmān bhāgavatānitthaṃ śrutvātha mithileśvaraḥ|

jāyanteyān munīn prītaḥ sopādhyāyo hyapūjayat|| 43

अर्थ

नारदजी कहते हैं—वसुदेवजी! मिथिलानरेश राजा निमि नौ योगीश्‍वरोंसे इस प्रकार भागवतधर्मोंका वर्णन सुनकर बहुत ही आनन्दित हुए। उन्होंने अपने ऋत्विज् और आचार्योंके साथ ऋषभनन्दन नव योगीश्‍वरोंकी पूजा की॥ ४३॥

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