महाभाग्यवान् वसुदेवजी! मैंने तुम्हारे आगे जिन भागवतधर्मोंका वर्णन किया है, तुम भी यदि श्रद्धाके साथ इनका आचरण करोगे तो अन्तमें सब आसक्तियोंसे छूटकर भगवान्का परमपद प्राप्त कर लोगे॥ ४५॥
त्वमप्येतान् महाभाग धर्मान् भागवताञ्छ्रुतान्।
आस्थितः श्रद्धया युक्तो निःसंगो यास्यसे परम्॥ ४५
महाभाग्यवान् वसुदेवजी! मैंने तुम्हारे आगे जिन भागवतधर्मोंका वर्णन किया है, तुम भी यदि श्रद्धाके साथ इनका आचरण करोगे तो अन्तमें सब आसक्तियोंसे छूटकर भगवान्का परमपद प्राप्त कर लोगे॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.5.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 743) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/5/45/