श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्रिय परीक्षित्! नारदजीके मुखसे यह सब सुनकर परम भाग्यवान् वसुदेवजी और परम भाग्यवती देवकीजीको बड़ा ही विस्मय हुआ। उनमें जो कुछ माया-मोह अवशेष था, उसे उन्होंने तत्क्षण छोड़ दिया॥ ५१॥
एतच्छ्रुत्वा महाभागो वसुदेवोऽतिविस्मितः।
देवकी च महाभागा जहतुर्मोहमात्मनः॥ ५१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्रिय परीक्षित्! नारदजीके मुखसे यह सब सुनकर परम भाग्यवान् वसुदेवजी और परम भाग्यवती देवकीजीको बड़ा ही विस्मय हुआ। उनमें जो कुछ माया-मोह अवशेष था, उसे उन्होंने तत्क्षण छोड़ दिया॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.5.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 744) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/5/51/