श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.13

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

केतुस्त्रिविक्रमयुतस्त्रिपतत्पताको

यस्ते भयाभयकरोऽसुरदेवचम्वोः।

स्वर्गाय साधुषु खलेष्वितराय भूमन्

पादः पुनातु भगवन् भजतामघं नः॥ १३

ketustrivikramayutastripatatpatāko

yaste bhayābhayakaro'suradevacamvoḥ|

svargāya sādhuṣu khaleṣvitarāya bhūman

pādaḥ punātu bhagavan bhajatāmaghaṃ naḥ|| 13

अर्थ

अनन्त! वामनावतारमें दैत्यराज बलिकी दी हुई पृथ्वीको नापनेके लिये जब आपने अपना पग उठाया था और वह सत्यलोकमें पहुँच गया था, तब यह ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई बहुत बड़ा विजयध्वज हो। ब्रह्माजीके पखारनेके बाद उससे गिरती हुई गंगाजीके जलकी तीन धाराएँ ऐसी जान पड़ती थीं, मानो उसमें लगी हुई तीन पताकाएँ फहरा रही हों। उसे देखकर असुरोंकी सेना भयभीत हो गयी थी और देवसेना निर्भय। आपका वह चरणकमल साधुस्वभाव पुरुषोंके लिये आपके धाम वैकुण्ठलोककी प्राप्तिका और दुष्टोंके लिये अधोगतिका कारण है। भगवन्! आपका वही पादपद्म हम भजन करनेवालोंके सारे पाप-ताप धो-बहा दे॥ १३॥✎ 1737 1738

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1737 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अधो-गतिका → अधोगतिका
  • #1738 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: जलाने-वाले → जलानेवाले

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें