श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.14

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

नस्योतगाव इव यस्य वशे भवन्ति

ब्रह्मादयस्तनुभृतो मिथुरर्द्यमानाः।

कालस्य ते प्रकृतिपूरुषयोः परस्य

शं नस्तनोतु चरणः पुरुषोत्तमस्य॥ १४

nasyotagāva iva yasya vaśe bhavanti

brahmādayastanubhṛto mithurardyamānāḥ|

kālasya te prakṛtipūruṣayoḥ parasya

śaṃ nastanotu caraṇaḥ puruṣottamasya|| 14

अर्थ

ब्रह्मा आदि जितने भी शरीरधारी हैं, वे सत्त्व, रज, तम—इन तीनों गुणोंके परस्पर-विरोधी त्रिविध भावोंकी टक्करसे जीते-मरते रहते हैं। वे सुख-दुःखके थपेड़ोंसे बाहर नहीं हैं और ठीक वैसे ही आपके वशमें हैं, जैसे नथे हुए बैल अपने स्वामीके वशमें होते हैं। आप उनके लिये भी कालस्वरूप हैं। उनके जीवनका आदि, मध्य और अन्त आपके ही अधीन है। इतना ही नहीं, आप प्रकृति और पुरुषसे भी परे स्वयं पुरुषोत्तम हैं। आपके चरणकमल हम-लोगोंका कल्याण करें॥ १४॥✎ 1737 1738

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1737 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अधो-गतिका → अधोगतिका
  • #1738 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: जलाने-वाले → जलानेवाले

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