श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.15

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमाना-

मव्यक्तजीवमहतामपि कालमाहुः।

सोऽयं त्रिणाभिरखिलापचये प्रवृत्तः

कालो गभीररय उत्तमपूरुषस्त्वम्॥ १५

asyāsi heturudayasthitisaṃyamānā-

mavyaktajīvamahatāmapi kālamāhuḥ|

so'yaṃ triṇābhirakhilāpacaye pravṛttaḥ

kālo gabhīraraya uttamapūruṣastvam|| 15

अर्थ

प्रभो! आप इस जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके परम कारण हैं; क्योंकि शास्त्रोंने ऐसा कहा है कि आप प्रकृति, पुरुष और महत्तत्त्वके भी नियन्त्रण करनेवाले काल हैं। शीत, ग्रीष्म और वर्षाकालरूप तीन नाभियोंवाले संवत्सरके रूपमें सबको क्षयकी ओर ले जानेवाले काल आप ही हैं। आपकी गति अबाध और गम्भीर है। आप स्वयं पुरुषोत्तम हैं॥ १५॥✎ 1737 1738

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1737 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अधो-गतिका → अधोगतिका
  • #1738 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: जलाने-वाले → जलानेवाले

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