श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

ज्ञानविज्ञानसंयुक्त आत्मभूतः शरीरिणाम्।

आत्मानुभवतुष्टात्मा नान्तरायैर्विहन्यसे॥ १०

jñānavijñānasaṃyukta ātmabhūtaḥ śarīriṇām|

ātmānubhavatuṣṭātmā nāntarāyairvihanyase|| 10

अर्थ

जब वेदोंके मुख्य तात्पर्य—निश्‍चयरूप ज्ञान और अनुभवरूप विज्ञानसे भलीभाँति सम्पन्‍न होकर तुम अपने आत्माके अनुभवमें ही आनन्दम‌ग्‍न रहोगे और सम्पूर्ण देवता आदि शरीरधारियोंके आत्मा हो जाओगे। इसलिये किसी भी विघ्नसे तुम पीडित नहीं हो सकोगे; क्योंकि उन विघ्नों और विघ्न करनेवालोंकी आत्मा भी तुम्हीं होगे॥ १०॥

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