श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.9

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तस्माद् युक्तेन्द्रियग्रामो युक्तचित्त इदं जगत्।

आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधीश्‍वरे॥ ९

tasmād yuktendriyagrāmo yuktacitta idaṃ jagat|

ātmanīkṣasva vitatamātmānaṃ mayyadhīśvare|| 9

अर्थ

इसलिये उद्धव! तुम पहले अपनी समस्त इन्द्रियोंको अपने वशमें कर लो, उनकी बागडोर अपने हाथमें ले लो और केवल इन्द्रियोंको ही नहीं, चित्तकी समस्त वृत्तियोंको भी रोक लो और फिर ऐसा अनुभव करो कि यह सारा जगत् अपने आत्मामें ही फैला हुआ है और आत्मा मुझ सर्वात्मा इन्द्रियातीत ब्रह्मसे एक है, अभिन्‍न है॥ ९॥

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