श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.8

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थो भ्रमः स गुणदोषभाक्।

कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा॥ ८

puṃso'yuktasya nānārtho bhramaḥ sa guṇadoṣabhāk|

karmākarmavikarmeti guṇadoṣadhiyo bhidā|| 8

अर्थ

जिस पुरुषका मन अशान्त है, असंयत है, उसीको पागलकी तरह अनेकों वस्तुएँ मालूम पड़ती हैं; वास्तवमें यह चित्तका भ्रम ही है। नानात्वका भ्रम हो जानेपर ही ‘यह गुण है’ और ‘यह दोष’ इस प्रकारकी कल्पना करनी पड़ती है । जिसकी बुद्धिमें गुण और दोषका भेद बैठ गया है, दृढ़मूल हो गया है, उसीके लिये कर्म*, अकर्म† और विकर्मरूप‡ भेदका प्रतिपादन हुआ है॥ ८॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    विहित कर्म।

    (मुद्रित पृष्ठ 752)
  2. †

    विहित कर्मका लोप।

    (मुद्रित पृष्ठ 752)
  3. ‡

    निषिद्ध कर्म।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 752)

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