श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.37

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

भूतैराक्रम्यमाणोऽपि धीरो दैववशानुगैः।

तद् विद्वान्‍न चलेन्मार्गादन्वशिक्षं क्षितेर्व्रतम्॥ ३७

bhūtairākramyamāṇo'pi dhīro daivavaśānugaiḥ|

tad vidvānna calenmārgādanvaśikṣaṃ kṣitervratam|| 37

अर्थ

मैंने पृथ्वीसे उसके धैर्यकी, क्षमाकी शिक्षा ली है। लोग पृथ्वीपर कितना आघात और क्या-क्या उत्पात नहीं करते; परन्तु वह न तो किसीसे बदला लेती है और न रोती-चिल्लाती है। संसारके सभी प्राणी अपने-अपने प्रारब्धके अनुसार चेष्टा कर रहे हैं, वे समय-समयपर भिन्‍न-भिन्‍न प्रकारसे जान या अनजानमें आक्रमण कर बैठते हैं। धीर पुरुषको चाहिये कि उनकी विवशता समझे, न तो अपना धीरज खोवे और न क्रोध करे। अपने मार्गपर ज्यों-का-त्यों चलता रहे॥ ३७॥

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