श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.47

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

स्वमायया सृष्टमिदं सदसल्लक्षणं विभुः।

प्रविष्ट ईयते तत्तत्स्वरूपोऽग्‍निरिवैधसि॥ ४७

svamāyayā sṛṣṭamidaṃ sadasallakṣaṇaṃ vibhuḥ|

praviṣṭa īyate tattatsvarūpo'gnirivaidhasi|| 47

अर्थ

साधक पुरुषको इसका विचार करना चाहिये कि जैसे अग्‍नि लम्बी-चौड़ी, टेढ़ी-सीधी लकड़ियोंमें रहकर उनके समान ही सीधी-टेढ़ी या लम्बी-चौड़ी दिखायी पड़ती है—वास्तवमें वह वैसी है नहीं; वैसे ही सर्वव्यापक आत्मा भी अपनी मायासे रचे हुए कार्य-कारणरूप जगत‍्में व्याप्त होनेके कारण उन-उन वस्तुओंके नाम-रूपसे कोई सम्बन्ध न होनेपर भी उनके रूपमें प्रतीत होने लगता है॥ ४७॥

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