श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.48

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

विसर्गाद्याः श्मशानान्ता भावा देहस्य नात्मनः।

कलानामिव चन्द्रस्य कालेनाव्यक्तवर्त्मना॥ ४८

visargādyāḥ śmaśānāntā bhāvā dehasya nātmanaḥ|

kalānāmiva candrasya kālenāvyaktavartmanā|| 48

अर्थ

मैंने चन्द्रमासे यह शिक्षा ग्रहण की है कि यद्यपि जिसकी गति नहीं जानी जा सकती, उस कालके प्रभावसे चन्द्रमाकी कलाएँ घटती-बढ़ती रहती हैं, तथापि चन्द्रमा तो चन्द्रमा ही है, वह न घटता है और न बढ़ता ही है; वैसे ही जन्मसे लेकर मृत्यु पर्यन्त जितनी भी अवस्थाएँ हैं, सब शरीरकी हैं, आत्मासे उनका कोई भी सम्बन्ध नहीं है॥ ४८॥

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