श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

न वस्तव्यं त्वयैवेह मया त्यक्ते महीतले।

जनोऽधर्मरुचिर्भद्र भविष्यति कलौ युगे॥ ५

na vastavyaṃ tvayaiveha mayā tyakte mahītale|

jano'dharmarucirbhadra bhaviṣyati kalau yuge|| 5

अर्थ

जब मैं इस पृथ्वीका त्याग कर दूँ तब तुम इसपर मत रहना; क्योंकि साधु उद्धव! कलियुगमें अधिकांश लोगोंकी रुचि अधर्ममें ही होगी॥ ५॥

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