श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

त्वं तु सर्वं परित्यज्य स्नेहं स्वजनबन्धुषु।

मय्यावेश्य मनः सम्यक् समदृग् विचरस्व गाम्॥ ६

tvaṃ tu sarvaṃ parityajya snehaṃ svajanabandhuṣu|

mayyāveśya manaḥ samyak samadṛg vicarasva gām|| 6

अर्थ

अब तुम अपने आत्मीय स्वजन और बन्धु-बान्धवोंका स्नेह-सम्बन्ध छोड़ दो और अनन्यप्रेमसे मुझमें अपना मन लगाकर समदृष्टिसे पृथ्वीमें स्वच्छन्द विचरण करो॥ ६॥

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