श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.56

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

यं यं वाञ्छति सा राजंस्तर्पयन्त्यनुकम्पिता।

तं तं समनयत् कामं कृच्छ्रेणाप्यजितेन्द्रियः॥ ५६

yaṃ yaṃ vāñchati sā rājaṃstarpayantyanukampitā|

taṃ taṃ samanayat kāmaṃ kṛcchreṇāpyajitendriyaḥ|| 56

अर्थ

राजन्! कबूतरीपर कबूतरका इतना प्रेम था कि वह जो कुछ चाहती, कबूतर बड़े-से-बड़ा कष्ट उठाकर उसकी कामना पूर्ण करता; वह कबूतरी भी अपने कामुक पतिकी कामनाएँ पूर्ण करती॥ ५६॥✎ 1820

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1820 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): बच्चे → हाथ-पैरवाले बच्चे

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