श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.65

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

कपोती स्वात्मजान् वीक्ष्य बालकान् जालसंवृतान्।

तानभ्यधावत् क्रोशन्ती क्रोशतो भृशदुःखिता॥ ६५

kapotī svātmajān vīkṣya bālakān jālasaṃvṛtān|

tānabhyadhāvat krośantī krośato bhṛśaduḥkhitā|| 65

अर्थ

कबूतरीने देखा कि उसके नन्हें-नन्हें बच्चे, उसके हृदयके टुकड़े जालमें फँसे हुए हैं और दुःखसे चें-चें कर रहे हैं। उन्हें ऐसी स्थितिमें देखकर कबूतरीके दुःखकी सीमा न रही। वह रोती-चिल्लाती उनके पास दौड़ गयी॥ ६५॥

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