श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.41

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

संसारकूपे पतितं विषयैर्मुषितेक्षणम्।

ग्रस्तं कालाहिनाऽऽत्मानं कोऽन्यस्त्रातुमधीश्‍वरः॥ ४१

saṃsārakūpe patitaṃ viṣayairmuṣitekṣaṇam|

grastaṃ kālāhinā''tmānaṃ ko'nyastrātumadhīśvaraḥ|| 41

अर्थ

यह जीव संसारके कूएँमें गिरा हुआ है। विषयोंने इसे अंधा बना दिया है, कालरूपी अजगरने इसे अपने मुँहमें दबा रखा है। अब भगवान्‌को छोड़कर इसकी रक्षा करनेमें दूसरा कौन समर्थ है॥ ४१॥✎ 1740

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1740 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: शान्ति-लाभ → शान्तिलाभ

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