श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.40

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

सन्तुष्टा श्रद्दधत्येतद्यथालाभेन जीवती।

विहराम्यमुनैवाहमात्मना रमणेन वै॥ ४०

santuṣṭā śraddadhatyetadyathālābhena jīvatī|

viharāmyamunaivāhamātmanā ramaṇena vai|| 40

अर्थ

अब मुझे प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जायगा उसीसे निर्वाह कर लूँगी और बड़े सन्तोष तथा श्रद्धाके साथ रहूँगी। मैं अब किसी दूसरे पुरुषकी ओर न ताककर अपने हृदयेश्‍वर, आत्मस्वरूप प्रभुके साथ ही विहार करूँगी॥ ४०॥✎ 1740

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1740 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: शान्ति-लाभ → शान्तिलाभ

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