श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.9.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान्

पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षुतया वितन्वन्।

स्वान्ते सकृच्छ्रमवरुद्धधनः स देहः

सृष्ट्वास्य बीजमवसीदति वृक्षधर्मा॥ २६

jāyātmajārthapaśubhṛtyagṛhāptavargān

puṣṇāti yatpriyacikīrṣutayā vitanvan|

svānte sakṛcchramavaruddhadhanaḥ sa dehaḥ

sṛṣṭvāsya bījamavasīdati vṛkṣadharmā|| 26

अर्थ

जीव जिस शरीरका प्रिय करनेके लिये ही अनेकों प्रकारकी कामनाएँ और कर्म करता है तथा स्त्री-पुत्र, धन-दौलत, हाथी-घोड़े, नौकर-चाकर, घर-द्वार और भाई-बन्धुओंका विस्तार करते हुए उनके पालन-पोषणमें लगा रहता है। बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ सहकर धनसंचय करता है। आयुष्य पूरी होनेपर वही शरीर स्वयं तो नष्ट होता ही है, वृक्षके समान दूसरे शरीरके लिये बीज बोकर उसके लिये भी दुःखकी व्यवस्था कर जाता है॥ २६॥

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