श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.9.27

एकादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

जिह्वैकतोऽमुमपकर्षति कर्हि तर्षा

शिश्‍नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्‍चित्।

घ्राणोऽन्यतश्‍चपलदृक् क्व च कर्मशक्ति-

र्बह्व्यः सपत्‍न्य इव गेहपतिं लुनन्ति॥ २७ ✎ 2147

jihvaikato'mumapakarṣati karhi tarṣā

śiśno'nyatastvagudaraṃ śravaṇaṃ kutaścit|

ghrāṇo'nyataścapaladṛk kva ca karmaśakti-

rbahvyaḥ sapatnya iva gehapatiṃ lunanti|| 27

अर्थ

जैसे बहुत-सी सौतें अपने एक पतिको अपनी-अपनी ओर खींचती हैं, वैसे ही जीवको जीभ एक ओर—स्वादिष्ट पदार्थोंकी ओर खींचती है तो प्यास दूसरी ओर—जलकी ओर; जननेन्द्रिय एक ओर—स्त्रीसंभोगकी ओर ले जाना चाहती है तो त्वचा, पेट और कान दूसरी ओर—कोमल स्पर्श, भोजन और मधुर शब्दकी ओर खींचने लगते हैं। नाक कहीं सुन्दर गन्ध सूँघनेके लिये ले जाना चाहती है तो चंचल नेत्र कहीं दूसरी ओर सुन्दर रूप देखनेके लिये। इस प्रकार कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ दोनों ही इसे सताती रहती हैं॥ २७॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2147 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): र्बह्वॺ: सप → र्बह्व्यः सप

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