श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.9.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तेषामभ्यवहारार्थं शालीन् रहसि पार्थिव।

अवघ्नन्त्याः प्रकोष्ठस्थाश्‍चक्रुः शंखाः स्वनं महत्॥ ६

teṣāmabhyavahārārthaṃ śālīn rahasi pārthiva|

avaghnantyāḥ prakoṣṭhasthāścakruḥ śaṃkhāḥ svanaṃ mahat|| 6

अर्थ

राजन्! उनको भोजन करानेके लिये वह घरके भीतर एकान्तमें धान कूटने लगी। उस समय उसकी कलाईमें पड़ी शंखकी चूड़ियाँ जोर-जोरसे बज रही थीं॥ ६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें