॥ श्रीहरिः ॥
तेषामभ्यवहारार्थं शालीन् रहसि पार्थिव।
अवघ्नन्त्याः प्रकोष्ठस्थाश्चक्रुः शंखाः स्वनं महत्॥ ६
teṣāmabhyavahārārthaṃ śālīn rahasi pārthiva|
avaghnantyāḥ prakoṣṭhasthāścakruḥ śaṃkhāḥ svanaṃ mahat|| 6
अर्थ
राजन्! उनको भोजन करानेके लिये वह घरके भीतर एकान्तमें धान कूटने लगी। उस समय उसकी कलाईमें पड़ी शंखकी चूड़ियाँ जोर-जोरसे बज रही थीं॥ ६॥
तेषामभ्यवहारार्थं शालीन् रहसि पार्थिव।
अवघ्नन्त्याः प्रकोष्ठस्थाश्चक्रुः शंखाः स्वनं महत्॥ ६
राजन्! उनको भोजन करानेके लिये वह घरके भीतर एकान्तमें धान कूटने लगी। उस समय उसकी कलाईमें पड़ी शंखकी चूड़ियाँ जोर-जोरसे बज रही थीं॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.9.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 770) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/9/6/