इस शब्दको निन्दित समझकर कुमारीको बड़ी लज्जा मालूम हुई* और उसने एक-एक करके सब चूड़ियाँ तोड़ डाली और दोनों हाथोंमें केवल दो-दो चूड़ियाँ रहने दीं॥ ७॥
सा तज्जुगुप्सितं मत्वा महती व्रीडिता ततः।
बभंजैकैकशः शंखान् द्वौ द्वौ पाण्योरशेषयत्॥ ७
इस शब्दको निन्दित समझकर कुमारीको बड़ी लज्जा मालूम हुई और उसने एक-एक करके सब चूड़ियाँ तोड़ डाली और दोनों हाथोंमें केवल दो-दो चूड़ियाँ रहने दीं॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.9.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 770) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/9/7/
टिप्पणियाँ
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क्योंकि उससे उसका स्वयं धान कूटना सूचित होता था, जो कि उसकी द्ररिद्रताका द्योतक था।