ubhayorapyabhūd ghoṣo hyavaghnantyāḥ sma śaṃkhayoḥ|
tatrāpyekaṃ nirabhidadekasmānnābhavad dhvaniḥ|| 8
अर्थ
अब वह फिर धान कूटने लगी। परन्तु वे दो-दो चूड़ियाँ भी बजने लगीं, तब उसने एक-एक चूड़ी और तोड़ दी। जब दोनों कलाइयोंमें केवल एक-एक चूड़ी रह गयी तब किसी प्रकारकी आवाज नहीं हुई॥ ८॥
उभयोरप्यभूद् घोषो ह्यवघ्नन्त्याः स्म शंखयोः।
तत्राप्येकं निरभिददेकस्मान्नाभवद् ध्वनिः॥ ८
अब वह फिर धान कूटने लगी। परन्तु वे दो-दो चूड़ियाँ भी बजने लगीं, तब उसने एक-एक चूड़ी और तोड़ दी। जब दोनों कलाइयोंमें केवल एक-एक चूड़ी रह गयी तब किसी प्रकारकी आवाज नहीं हुई॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.9.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 770) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/9/8/