जब उन्होंने आँखें खोलीं, तब देखा कि तीनों लोकोंके एकमात्र गुरु भगवान् शंकर श्रीपार्वतीजी तथा अपने गणोंके साथ पधारे हुए हैं। उन्होंने उनके चरणोंमें माथा टेककर प्रणाम किया॥ १४॥
नेत्रे उन्मील्य ददृशे सगणं सोमयाऽऽगतम्।
रुद्रं त्रिलोकैकगुरुं ननाम शिरसा मुनिः॥ १४
जब उन्होंने आँखें खोलीं, तब देखा कि तीनों लोकोंके एकमात्र गुरु भगवान् शंकर श्रीपार्वतीजी तथा अपने गणोंके साथ पधारे हुए हैं। उन्होंने उनके चरणोंमें माथा टेककर प्रणाम किया॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.10.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 960) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/10/14/