श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.14

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

नेत्रे उन्मील्य ददृशे सगणं सोमयाऽऽगतम्।

रुद्रं त्रिलोकैकगुरुं३ ननाम शिरसा मुनिः॥ १४

netre unmīlya dadṛśe sagaṇaṃ somayā''gatam|

rudraṃ trilokaikaguruṃ nanāma śirasā muniḥ|| 14

अर्थ

जब उन्होंने आँखें खोलीं, तब देखा कि तीनों लोकोंके एकमात्र गुरु भगवान् शंकर श्रीपार्वतीजी तथा अपने गणोंके साथ पधारे हुए हैं। उन्होंने उनके चरणोंमें माथा टेककर प्रणाम किया॥ १४॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    विलोक्यैक०।

    (मुद्रित पृष्ठ 960)

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