श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.18

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

सूत उवाच

एवं स्तुतः स भगवानादिदेवः सतां गतिः।

परितुष्टः प्रसन्‍नात्मा प्रहसंस्तमभाषत॥ १८

parituṣṭaḥ prasannātmā prahasaṃstamabhāṣata|| 18

अर्थ

सूतजी कहते हैं—शौनकजी! जब मार्कण्डेय मुनिने संतोंके परम आश्रय देवाधिदेव भगवान् शंकरकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे उनपर अत्यन्त सन्तुष्ट हुए और बड़े प्रसन्‍नचित्तसे हँसते हुए कहने लगे॥ १८॥

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