सूतजी कहते हैं—शौनकजी! जब मार्कण्डेय मुनिने संतोंके परम आश्रय देवाधिदेव भगवान् शंकरकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे उनपर अत्यन्त सन्तुष्ट हुए और बड़े प्रसन्नचित्तसे हँसते हुए कहने लगे॥ १८॥
परितुष्टः प्रसन्नात्मा प्रहसंस्तमभाषत॥ १८
सूतजी कहते हैं—शौनकजी! जब मार्कण्डेय मुनिने संतोंके परम आश्रय देवाधिदेव भगवान् शंकरकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे उनपर अत्यन्त सन्तुष्ट हुए और बड़े प्रसन्नचित्तसे हँसते हुए कहने लगे॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.10.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 961) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/10/18/