श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.2

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

मार्कण्डेय उवाच

प्रपन्‍नोऽस्म्यङ्‌घ्रिमूलं ते प्रपन्‍नाभयदं हरे।

यन्माययापि विबुधा मुह्यन्ति ज्ञानकाशया॥ २

prapanno'smyaṅghrimūlaṃ te prapannābhayadaṃ hare|

yanmāyayāpi vibudhā muhyanti jñānakāśayā|| 2

अर्थ

मार्कण्डेयजीने मन-ही-मन कहा—प्रभो! आपकी माया वास्तवमें प्रतीतिमात्र होनेपर भी सत्य ज्ञानके समान प्रकाशित होती है और बड़े-बड़े विद्वान् भी उसके खेलोंमें मोहित हो जाते हैं। आपके श्रीचरणकमल ही शरणागतोंको सब प्रकारसे अभयदान करते हैं। इसलिये मैंने उन्हींकी शरण ग्रहण की है॥ २॥

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