अनन्त! आपके श्रेष्ठ दर्शनसे बढ़कर ऐसी और कौन-सी वस्तु है, जिसे मैं वरदानके रूपमें माँगूँ? मनुष्य आपके दर्शनसे ही पूर्णकाम और सत्यसंकल्प हो जाता है॥ ३३॥
कं वृणे नु परं भूमन् वरं त्वद् वरदर्शनात्।
यद्दर्शनात् पूर्णकामः सत्यकामः पुमान् भवेत्॥ ३३
अनन्त! आपके श्रेष्ठ दर्शनसे बढ़कर ऐसी और कौन-सी वस्तु है, जिसे मैं वरदानके रूपमें माँगूँ? मनुष्य आपके दर्शनसे ही पूर्णकाम और सत्यसंकल्प हो जाता है॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.10.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 962) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/10/33/