श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.33

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

कं वृणे नु परं भूमन् वरं त्वद् वरदर्शनात्।

यद्दर्शनात् पूर्णकामः सत्यकामः पुमान् भवेत्॥ ३३

kaṃ vṛṇe nu paraṃ bhūman varaṃ tvad varadarśanāt|

yaddarśanāt pūrṇakāmaḥ satyakāmaḥ pumān bhavet|| 33

अर्थ

अनन्त! आपके श्रेष्ठ दर्शनसे बढ़कर ऐसी और कौन-सी वस्तु है, जिसे मैं वरदानके रूपमें माँगूँ? मनुष्य आपके दर्शनसे ही पूर्णकाम और सत्यसंकल्प हो जाता है॥ ३३॥

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