श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.5

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

निभृतोदझषव्रातं वातापाये यथार्णवम्।

कुर्वस्य तपसः साक्षात् संसिद्धिं सिद्धिदो भवान्॥ ५

nibhṛtodajhaṣavrātaṃ vātāpāye yathārṇavam|

kurvasya tapasaḥ sākṣāt saṃsiddhiṃ siddhido bhavān|| 5

अर्थ

जब भगवती पार्वतीने मार्कण्डेय मुनिको ध्यानकी अवस्थामें देखा, तब उनका हृदय वात्सल्य-स्नेहसे उमड़ आया। उन्होंने शंकरजीसे कहा—‘भगवन्! तनिक इस ब्राह्मणकी ओर तो देखिये। जैसे तूफान शान्त हो जानेपर समुद्रकी लहरें और मछलियाँ शान्त हो जाती हैं और समुद्र धीर-गम्भीर हो जाता है, वैसे ही इस ब्राह्मणका शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरण शान्त हो रहा है। समस्त सिद्धियोंके दाता आप ही हैं। इसलिये कृपा करके आप इस ब्राह्मणकी तपस्याका प्रत्यक्ष फल दीजिये’॥ ४-५॥

यह अर्थ श्लोक 4–5 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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