श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.11.2

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

तान्त्रिकाः परिचर्यायां केवलस्य श्रियः पतेः।

अंगोपांगायुधाकल्पं कल्पयन्ति यथा च यैः॥ २

tāntrikāḥ paricaryāyāṃ kevalasya śriyaḥ pateḥ|

aṃgopāṃgāyudhākalpaṃ kalpayanti yathā ca yaiḥ|| 2

अर्थ

हमलोग क्रियायोगका यथावत् ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं; क्योंकि उसका कुशलतापूर्वक ठीक-ठीक आचरण करनेसे मरणधर्मा पुरुष अमरत्व प्राप्त कर लेता है। अतः आप हमें यह बतलाइये कि पांचरात्रादि तन्त्रोंकी विधि जाननेवाले लोग केवल श्रीलक्ष्मीपति भगवान्‌की आराधना करते समय किन-किन तत्त्वोंसे उनके चरणादि अंग, गरुडादि उपांग, सुदर्शनादि आयुध और कौस्तुभादि आभूषणोंकी कल्पना करते हैं? भगवान् आपका कल्याण करें॥ २-३॥

यह अर्थ श्लोक 2–3 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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