॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.12.17
दक्षजन्म प्रचेतोभ्यस्तत्पुत्रीणां च सन्ततिः।
यतो देवासुरनरास्तिर्यङ्नगखगादयः॥ १७
dakṣajanma pracetobhyastatputrīṇāṃ ca santatiḥ|
yato devāsuranarāstiryaṅnagakhagādayaḥ|| 17
अर्थ
शौनकादि ऋषियो! छठे स्कन्धमें ये विषय आये हैं—प्रचेताओंसे दक्षकी उत्पत्ति; दक्ष-पुत्रियोंकी सन्तान देवता, असुर, मनुष्य, पशु, पर्वत और पक्षियोंका जन्म-कर्म; वृत्रासुरकी उत्पत्ति और उसकी परम गति। (अब सातवें स्कन्धके विषय बतलाये जाते हैं—) इस स्कन्धमें मुख्यतः दैत्यराज हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्षके जन्म-कर्म एवं दैत्यशिरोमणि महात्मा प्रह्लादके उत्कृष्ट चरित्रका निरूपण है॥ १७-१८॥