श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.2.34

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

दिव्याब्दानां सहस्रान्ते चतुर्थे तु पुनः कृतम्।

भविष्यति यदा नॄणां मन आत्मप्रकाशकम्॥ ३४

divyābdānāṃ sahasrānte caturthe tu punaḥ kṛtam|

bhaviṣyati yadā nṝṇāṃ mana ātmaprakāśakam|| 34

अर्थ

परीक्षित्! जब देवताओंकी वर्षगणनाके अनुसार एक हजार वर्ष बीत चुकेंगे, तब कलियुगके अन्तिम दिनोंमें फिरसे कल्किभगवान्‌की कृपासे मनुष्योंके मनमें सात्त्विकताका संचार होगा, लोग अपने वास्तविक स्वरूपको जान सकेंगे और तभीसे सत्ययुगका प्रारम्भ भी होगा॥ ३४॥✎ 1924

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1924 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): परम-धामको → परमधामको

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