श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.2.7

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

दाक्ष्यं कुटुम्बभरणं यशोऽर्थे धर्मसेवनम्।

एवं प्रजाभिर्दुष्टाभिराकीर्णे क्षितिमण्डल॥ ७

dākṣyaṃ kuṭumbabharaṇaṃ yaśo'rthe dharmasevanam|

evaṃ prajābhirduṣṭābhirākīrṇe kṣitimaṇḍala|| 7

अर्थ

योग्यता चतुराईका सबसे बड़ा लक्षण यह होगा कि मनुष्य अपने कुटुम्बका पालन कर ले। धर्मका सेवन यशके लिये किया जायगा। इस प्रकार जब सारी पृथ्वीपर दुष्टोंका बोलबाला हो जायगा, तब राजा होनेका कोई नियम न रहेगा; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्रोंमें जो बली होगा, वही राजा बन बैठेगा। उस समयके नीच राजा अत्यन्त निर्दय एवं क्रूर होंगे; लोभी तो इतने होंगे कि उनमें और लुटेरोंमें कोई अन्तर न किया जा सकेगा। वे प्रजाकी पूँजी एवं पत्‍नियोंतकको छीन लेंगे। उनसे डरकर प्रजा पहाड़ों और जंगलोंमें भाग जायगी। उस समय प्रजा तरह-तरहके शाक, कन्द-मूल, मांस, मधु, फल-फूल और बीज-गुठली आदि खा-खाकर अपना पेट भरेगी॥ ७—९॥

यह अर्थ श्लोक 7–9 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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