श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.48

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

विद्यातपःप्राणनिरोधमैत्री-

तीर्थाभिषेकव्रतदानजप्यैः ।

नात्यन्तशुद्धिं लभतेऽन्तरात्मा

यथा हृदिस्थे भगवत्यनन्ते॥ ४८

vidyātapaḥprāṇanirodhamaitrī-

tīrthābhiṣekavratadānajapyaiḥ |

nātyantaśuddhiṃ labhate'ntarātmā

yathā hṛdisthe bhagavatyanante|| 48

अर्थ

परीक्षित्! विद्या, तपस्या, प्राणायाम, समस्त प्राणियोंके प्रति मित्रभाव, तीर्थस्नान, व्रत, दान और जप आदि किसी भी साधनसे मनुष्यके अन्तःकरणकी वैसी वास्तविक शुद्धि नहीं होती, जैसी शुद्धि भगवान् पुरुषोत्तमके हृदयमें विराजमान हो जानेपर होती है॥ ४८॥

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