श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.50

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

म्रियमाणैरभिध्येयो भगवान् परमेश्‍वरः।

आत्मभावं नयत्यंग सर्वात्मा सर्वसंश्रयः॥ ५०

mriyamāṇairabhidhyeyo bhagavān parameśvaraḥ|

ātmabhāvaṃ nayatyaṃga sarvātmā sarvasaṃśrayaḥ|| 50

अर्थ

जो लोग मृत्युके निकट पहुँच रहे हैं, उन्हें सब प्रकारसे परम ऐश्‍वर्यशाली भगवान्‌का ही ध्यान करना चाहिये। प्यारे परीक्षित्! सबके परम आश्रय और सर्वात्मा भगवान् अपना ध्यान करनेवालेको अपने स्वरूपमें लीन कर लेते हैं, उसे अपना स्वरूप बना लेते हैं॥ ५०॥✎ 1781

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1781 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वालेको → करनेवालेको

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें