श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.13

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

शतं वर्षाणि वर्षन्ति नदन्ति रभसस्वनैः।

तत एकोदकं विश्‍वं ब्रह्माण्डविवरान्तरम्॥ १३

śataṃ varṣāṇi varṣanti nadanti rabhasasvanaiḥ|

tata ekodakaṃ viśvaṃ brahmāṇḍavivarāntaram|| 13

अर्थ

वायुके वेगसे वह और भी बढ़ जाती है और तल-अतल आदि सातों नीचेके लोकोंको भस्म कर देती है। वहाँके प्राणी तो पहले ही मर चुके होते हैं नीचेसे आगकी करारी लपटें और ऊपरसे सूर्यकी प्रचण्ड गरमी! उस समय ऊपर-नीचे, चारों ओर यह ब्रह्माण्ड जलने लगता है और ऐसा जान पड़ता है, मानो गोबरका उपला जलकर अंगारेके रूपमें दहक रहा हो। इसके बाद प्रलयकालीन अत्यन्त प्रचण्ड सांवर्तक वायु सैकड़ों वर्षोंतक चलती रहती है। उस समयका आकाश धूएँ और धूलसे तो भरा ही रहता है, उसके बाद असंख्यों रंग-बिरंगे बादल आकाशमें मँडराने लगते हैं और बड़ी भयंकरताके साथ गरज-गरजकर सैकड़ों वर्षोंतक वर्षा करते रहते हैं। उस समय ब्रह्माण्डके भीतरका सारा संसार एक समुद्र हो जाता है, सब कुछ जलम‌ग्‍न हो जाता है॥ १०—१३॥

यह अर्थ श्लोक 10–13 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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