श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.18

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

महान् ग्रसत्यहंकारं गुणाः सत्त्वादयश्‍च तम्।

ग्रसतेऽव्याकृतं राजन् गुणान् कालेन चोदितम्॥ १८

mahān grasatyahaṃkāraṃ guṇāḥ sattvādayaśca tam|

grasate'vyākṛtaṃ rājan guṇān kālena coditam|| 18

अर्थ

तत्पश्‍चात् महत्तत्त्व अहंकारको और सत्त्व आदि गुण महत्तत्त्वको ग्रस लेते हैं। परीक्षित्! यह सब कालकी महिमा है। उसीकी प्रेरणासे अव्यक्त प्रकृति गुणोंको ग्रस लेती है और तब केवल प्रकृति-ही-प्रकृति शेष रह जाती है॥ १८॥

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