राजन्! एक हजार चतुर्युगीका ब्रह्माका एक दिन होता है। ब्रह्माके इस दिनको ही कल्प भी कहते हैं। एक कल्पमें चौदह मनु होते हैं॥ २॥
चतुर्युगसहस्रं च ब्रह्मणो दिनमुच्यते।
स कल्पो यत्र मनवश्चतुर्दश विशांपते॥ २
राजन्! एक हजार चतुर्युगीका ब्रह्माका एक दिन होता है। ब्रह्माके इस दिनको ही कल्प भी कहते हैं। एक कल्पमें चौदह मनु होते हैं॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.4.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 924) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/2/