श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.22

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

लयः प्राकृतिको ह्येष पुरुषाव्यक्तयोर्यदा।

शक्तयः सम्प्रलीयन्ते विवशाः कालविद्रुताः॥ २२

layaḥ prākṛtiko hyeṣa puruṣāvyaktayoryadā|

śaktayaḥ sampralīyante vivaśāḥ kālavidrutāḥ|| 22

अर्थ

इसी अवस्थाका नाम ‘प्राकृत प्रलय’ है। उस समय पुरुष और प्रकृति दोनोंकी शक्तियाँ कालके प्रभावसे क्षीण हो जाती हैं और विवश होकर अपने मूल-स्वरूपमें लीन हो जाती हैं॥ २२॥

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