इस प्रकार कालके उपद्रवसे पीड़ित होकर धीरे-धीरे सारी प्रजा क्षीण हो जाती है। प्रलयकालीन सांवर्तक सूर्य अपनी प्रचण्ड किरणोंसे समुद्र, प्राणियोंके शरीर और पृथ्वीका सारा रस खींच-खींचकर सोख जाते हैं और फिर उन्हें सदाकी भाँति पृथ्वीपर बरसाते नहीं। उस समय संकर्षणभगवान्के मुखसे प्रलयकालीन संवर्तक अग्नि प्रकट होती है॥ ८-९॥
यह अर्थ श्लोक 8–9 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
रश्मिभिः पिबते घोरैः सर्वं नैव विमुंचति।
ततः संवर्तको वह्निः संकर्षणमुखोत्थितः॥ ९
इस प्रकार कालके उपद्रवसे पीड़ित होकर धीरे-धीरे सारी प्रजा क्षीण हो जाती है। प्रलयकालीन सांवर्तक सूर्य अपनी प्रचण्ड किरणोंसे समुद्र, प्राणियोंके शरीर और पृथ्वीका सारा रस खींच-खींचकर सोख जाते हैं और फिर उन्हें सदाकी भाँति पृथ्वीपर बरसाते नहीं। उस समय संकर्षणभगवान्के मुखसे प्रलयकालीन संवर्तक अग्नि प्रकट होती है॥ ८-९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.4.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 925) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/9/