श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.5.2

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

त्वं तु राजन् मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि।

न जातः प्रागभूतोऽद्य देहवत्त्वं न नङ्क्ष्यसि॥ २

tvaṃ tu rājan mariṣyeti paśubuddhimimāṃ jahi|

na jātaḥ prāgabhūto'dya dehavattvaṃ na naṅkṣyasi|| 2

अर्थ

हे राजन्! अब तुम यह पशुओंकी-सी अविवेकमूलक धारणा छोड़ दो कि मैं मरूँगा; जैसे शरीर पहले नहीं था और अब पैदा हुआ और फिर नष्ट हो जायगा, वैसे ही तुम भी पहले नहीं थे, तुम्हारा जन्म हुआ, तुम मर जाओगे—यह बात नहीं है॥ २॥

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