श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.5.4

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

स्वप्ने यथा शिरश्छेदं पंचत्वाद्यात्मनः स्वयम्।

यस्मात् पश्यति देहस्य तत आत्मा ह्यजोऽमरः॥ ४

svapne yathā śiraśchedaṃ paṃcatvādyātmanaḥ svayam|

yasmāt paśyati dehasya tata ātmā hyajo'maraḥ|| 4

अर्थ

स्वप्नावस्थामें ऐसा मालूम होता है कि मेरा सिर कट गया है और मैं मर गया हूँ, मुझे लोग श्मशानमें जला रहे हैं; परन्तु ये सब शरीरकी ही अवस्थाएँ दीखती हैं, आत्माकी नहीं। देखनेवाला तो उन अवस्थाओंसे सर्वथा परे, जन्म और मृत्युसे रहित, शुद्ध-बुद्ध परमतत्त्वस्वरूप है॥ ४॥

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