yathā juhāva saṃkruddho nāgān satre saha dvijaiḥ|| 16
अर्थ
जब जनमेजयने सुना कि तक्षकने मेरे पिताजीको डस लिया है, तो उसे बड़ा क्रोध हुआ। अब वह ब्राह्मणोंके साथ विधिपूर्वक सर्पोंका अग्निकुण्डमें हवन करने लगा॥ १६॥
जनमेजयः स्वपितरं श्रुत्वा तक्षकभक्षितम्।
यथा जुहाव संक्रुद्धो नागान् सत्रे सह द्विजैः॥ १६
जब जनमेजयने सुना कि तक्षकने मेरे पिताजीको डस लिया है, तो उसे बड़ा क्रोध हुआ। अब वह ब्राह्मणोंके साथ विधिपूर्वक सर्पोंका अग्निकुण्डमें हवन करने लगा॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.6.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 934) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/6/16/