श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.16

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

जनमेजयः स्वपितरं श्रुत्वा तक्षकभक्षितम्।

यथा जुहाव संक्रुद्धो नागान् सत्रे सह द्विजैः॥ १६

janamejayaḥ svapitaraṃ śrutvā takṣakabhakṣitam|

yathā juhāva saṃkruddho nāgān satre saha dvijaiḥ|| 16

अर्थ

जब जनमेजयने सुना कि तक्षकने मेरे पिताजीको डस लिया है, तो उसे बड़ा क्रोध हुआ। अब वह ब्राह्मणोंके साथ विधिपूर्वक सर्पोंका अग्‍निकुण्डमें हवन करने लगा॥ १६॥

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