‘नरेन्द्र! सर्पराज तक्षकको मार डालना आपके योग्य काम नहीं है। यह अमृत पी चुका है। इसलिये यह अजर और अमर है॥ २४॥
नैष त्वया मनुष्येन्द्र वधमर्हति सर्पराट्।
अनेन पीतममृतमथ वा अजरामरः॥ २४
‘नरेन्द्र! सर्पराज तक्षकको मार डालना आपके योग्य काम नहीं है। यह अमृत पी चुका है। इसलिये यह अजर और अमर है॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.6.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 935) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/6/24/