श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.3

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

नात्यद्भुतमहं मन्ये महतामच्युतात्मनाम्।

अज्ञेषु तापतप्तेषु भूतेषु यदनुग्रहः॥ ३

nātyadbhutamahaṃ manye mahatāmacyutātmanām|

ajñeṣu tāpatapteṣu bhūteṣu yadanugrahaḥ|| 3

अर्थ

संसारके प्राणी अपने स्वार्थ और परमार्थके ज्ञानसे शून्य हैं और विभिन्‍न प्रकारके दुःखोंके दावानलसे दग्ध हो रहे हैं। उनके ऊपर भगवन्मय महात्माओंका अनुग्रह होना कोई नयी घटना अथवा आश्‍चर्यकी बात नहीं है। यह तो उनके लिये स्वाभाविक ही है॥ ३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें