श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.74

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

यजुर्भिरकरोच्छाखा दशपंच शतैर्विभुः।

जगृहुर्वाजसन्यस्ताः काण्वमाध्यन्दिनादयः॥ ७४

yajurbhirakarocchākhā daśapaṃca śatairvibhuḥ|

jagṛhurvājasanyastāḥ kāṇvamādhyandinādayaḥ|| 74

अर्थ

इसके बाद याज्ञवल्क्यमुनिने यजुर्वेदके असंख्य मन्त्रोंसे उसकी पंद्रह शाखाओंकी रचना की। वही वाजसनेय शाखाके नामसे प्रसिद्ध हैं। उन्हें कण्व, माध्यन्दिन आदि ऋषियोंने ग्रहण किया॥ ७४॥

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