पौष्यंजि और आवन्त्यके पाँच सौ शिष्य थे। वे उत्तर दिशाके निवासी होनेके कारण औदीच्य सामवेदी कहलाते थे। उन्हींको प्राच्य सामवेदी भी कहते हैं। उन्होंने एक-एक संहिताका अध्ययन किया॥ ७८॥
उदीच्याः सामगाः शिष्या आसन् पंचशतानि वै।
पौष्यञ्ज्यावन्त्ययोश्चापि तांश्च प्राच्यान् प्रचक्षते॥ ७८
पौष्यंजि और आवन्त्यके पाँच सौ शिष्य थे। वे उत्तर दिशाके निवासी होनेके कारण औदीच्य सामवेदी कहलाते थे। उन्हींको प्राच्य सामवेदी भी कहते हैं। उन्होंने एक-एक संहिताका अध्ययन किया॥ ७८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.6.78 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 942) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/6/78/