श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.7.13

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

वृत्तिर्भूतानि भूतानां चराणामचराणि च।

कृता स्वेन नृणां तत्र कामाच्चोदनयापि वा॥ १३✎ 1241

vṛttirbhūtāni bhūtānāṃ carāṇāmacarāṇi ca|

kṛtā svena nṛṇāṃ tatra kāmāccodanayāpi vā|| 13

अर्थ

चर प्राणियोंकी अचर-पदार्थ ‘वृत्ति’ अर्थात् जीवन-निर्वाहकी सामग्री है। चर प्राणियोंके दुग्ध आदि भी इनमेंसे मनुष्योंने कुछ तो स्वभाववश कामनाके अनुसार निश्‍चित कर ली है और कुछने शास्त्रके आज्ञानुसार॥ १३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1241 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां

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